Class 12, HINDI LITERATURE

Class 12 : हिंदी साहित्य – अध्याय 11.पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी

संक्षिप्त लेखक परिचय

✨ चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ – लेखक परिचय (200 शब्द) ✨

🔵 जन्म व प्रारंभिक जीवन

चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ का जन्म 7 जुलाई 1883 को जयपुर (राजस्थान) में हुआ।

वे संस्कृत और हिंदी के विद्वान परिवार में पैदा हुए और बचपन से ही साहित्य, भाषा व संस्कृति में गहरी रुचि रखते थे।

🟢 शिक्षा व विद्वत्ता

उन्होंने संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी का गहन अध्ययन किया।

बनारस और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की और भाषाशास्त्र व इतिहास के विद्वान बने।

🔴 साहित्यिक योगदान

गुलेरी हिंदी साहित्य में लघुकथा के जनक माने जाते हैं।

उनकी प्रसिद्ध रचना “उसने कहा था” हिंदी की पहली सशक्त लघुकथा के रूप में प्रसिद्ध हुई, जिसमें भावुकता, संवेदनशीलता और राष्ट्रप्रेम की गहरी छाप मिलती है।

उन्होंने निबंध, समीक्षा, भाषावैज्ञानिक लेख तथा ऐतिहासिक विषयों पर भी उल्लेखनीय कार्य किया।

🟡 विशेषताएँ व शैली

उनकी रचनाओं में सरलता, स्वाभाविकता और यथार्थ चित्रण मिलता है।

भाषा संस्कारित, रोचक और सहज बोधगम्य है।

🌿 निधन

उनका निधन 12 सितंबर 1922 को मात्र 39 वर्ष की आयु में हुआ।

अल्पायु के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य को अमूल्य धरोहर दी और साहित्य-जगत में अमर हो गए।

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पाठ का विश्लेषण  एवं  विवेचन

🌟 सुमिरिनी के मनके – सार और दार्शनिक विश्लेषण 🌟

✨ कृति का शीर्षक और दार्शनिक अर्थ
🔹 ‘सुमिरिनी के मनके’ शीर्षक में गहरा दार्शनिक संदेश निहित है।
🔹 ‘सुमिरिनी’ शब्द ‘सुमिरन’ से बना है जिसका अर्थ है स्मरण, चिंतन या ध्यान।
🔹 ‘मनके’ माला में पिरोए मोतियों को कहते हैं।
🔹 यह शीर्षक उन मूल्यवान विचार-रत्नों का प्रतीक है जो मानव कल्याण के लिए सदैव स्मरणीय हैं।
🔹 गुलेरी जी ने अपने तीन निबंधों को ‘सुमिरन योग्य मनके’ कहा है क्योंकि इनमें जीवन के मूलभूत सत्यों का उद्घाटन है।

🟢 प्रथम निबंध: बालक बच गया – गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
🌍 सामाजिक परिवेश और शैक्षिक वातावरण


🔸 बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों की शिक्षा व्यवस्था का यथार्थ चित्रण किया गया।
🔸 पाठशाला का वार्षिकोत्सव शिक्षा-जगत की विडंबना का प्रतीक है।
🔸 प्रधानाध्यापक का आठ वर्षीय पुत्र “मिस्टर हादी के कोल्हू” की भांति प्रदर्शित किया जा रहा था।


💔 बालक की शारीरिक और मानसिक व्यथा
🔹 “उसका मुँह पीला था, आँखें सफेद थीं, दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी” – यह वर्णन गहरी पीड़ा को दर्शाता है।
🔹 पीला मुँह ➡️ कुपोषण का संकेत।
🔹 सफेद आँखें ➡️ निर्जीवता का प्रतीक।
🔹 भूमि की ओर झुकी दृष्टि ➡️ हीनभावना और डर का प्रमाण।


⚖️ प्रश्नों की गंभीर विषमता
🔸 धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम की पत्नियों के नाम – यह सब 8 वर्षीय बच्चे की क्षमता से कहीं अधिक कठिन।
🔸 यह परंपरा आज भी शिक्षा व्यवस्था में मौजूद है।


🎭 आदर्शवादी उत्तर की विडंबना
🔹 “मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा” – एक बच्चे के मुंह से यह अस्वाभाविक और दिखावटी उत्तर।
🔹 समाज कृत्रिम आदर्शवाद से प्रसन्न होता है परंतु वास्तविक भावनाओं को अनदेखा करता है।


⚡ मानसिक द्वंद्व का चित्रण
🔸 इनाम मांगने पर “मुख पर विलक्षण रंगों का परिवर्तन” हुआ।
🔸 कृत्रिम और स्वाभाविक भावों की लड़ाई का चित्रण बाल-मनोविज्ञान की समझ को दर्शाता है।


🌿 स्वाभाविकता की विजय
🔹 अंततः बालक ने लड्डू मांगा।
🔹 लेखक ने इसे “जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर” कहा, जो “मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट” से श्रेष्ठ है।

🔵 द्वितीय निबंध: घड़ी के पुर्जे – धार्मिक कट्टरता पर व्यंग्य
⛪ धार्मिक एकाधिकारवाद की आलोचना
🔸 धर्मगुरु कहते हैं ➡️ जनता को धर्म के रहस्य जानने की आवश्यकता नहीं, बस उनकी बातें मान लो।
⏰ घड़ी का प्रभावशाली दृष्टांत
🔹 धर्मगुरुओं का तर्क ➡️ घड़ी देखकर समय जान लो, पुर्जों की आवश्यकता नहीं।
🔹 लेखक का प्रतिवाद ➡️ घड़ी बनाने वाले ने पहले पुर्जों को समझा तभी उसे बनाया।


🧠 तर्कसंगत चिंतन की वकालत
🔸 धर्म में भी तर्क और विवेक का स्थान आवश्यक है।
🔸 हर व्यक्ति को धर्म के सिद्धांतों को समझने और प्रश्न करने का अधिकार है।

🔴 तृतीय निबंध: ढेले चुन लो – अंधविश्वास का खंडन
💍 विवाह प्रथा में अंधविश्वास
🔹 वधू को विभिन्न स्थानों की मिट्टी के ढेले दिए जाते थे।
🔹 वेदी की मिट्टी चुनने पर पंडित, गौशाला की मिट्टी चुनने पर धनवान बनने की भविष्यवाणी।


🕊️ भविष्य की अनिश्चितता पर बल
🔸 “आज का कबूतर तेजपिंड से उड़ सकता है” – भविष्य की अनिश्चितता का गहरा दर्शन।


💡 वर्तमान के महत्व पर जोर
🔹 “हाथ का पैसा दूर के मोल से बेहतर है” – व्यावहारिक जीवन-दर्शन का उद्घाटन।
🔹 भविष्य की काल्पनिक योजनाओं में उलझने के बजाय वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए।

📚 साहित्यिक विशेषताएं
🌸 भाषा की सरलता और गहराई
🔹 खड़ी बोली हिंदी का प्रभावी प्रयोग।
🔹 सरल, स्पष्ट और प्रवाहमान भाषा।
🔹 संस्कृत तत्सम शब्दों का संयमित प्रयोग।


🎯 व्यंग्य की तीक्ष्णता
🔸 व्यंग्य कटु नहीं, सुधारवादी है।
🔸 समाज की कुरीतियों पर प्रहार सुधार की भावना से।


🎨 चित्रात्मकता
🔹 बालक के शारीरिक और मानसिक चित्रण में जीवंतता।
🔹 प्रत्येक प्रसंग में प्रभावशाली चित्रात्मकता।

🌍 आधुनिक प्रासंगिकता
🔸 शिक्षा में आज भी रटंत प्रणाली हावी है।
🔸 बच्चों पर अनावश्यक दबाव डाला जाता है।
🔸 धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरता अब भी व्याप्त है।

🌟 निष्कर्ष
🔹 ‘सुमिरिनी के मनके’ केवल साहित्यिक मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक दस्तावेज है।


🔹 संदेश:
✅ बच्चों की स्वाभाविकता का सम्मान करें।
✅ धार्मिक कट्टरता से बचें।
✅ अंधविश्वास त्यागें।
✅ वर्तमान में जीकर भविष्य का निर्माण करें।

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

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(क) बालक बच गया

प्रश्न 1. बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?
उत्तर:
🔵 धर्म के 10 लक्षण।
🟢 9 रसों के नाम व उदाहरण।
🔴 पानी के 4° C से नीचे फैलने का कारण और मछलियों की प्राणरक्षा।
🟡 चन्द्रग्रहण का वैज्ञानिक कारण।
🟣 “अभाव” को पदार्थ मानने-न-मानने का तर्क।
🟠 इंग्लैण्ड के राजा हेनरी अष्टम की पत्नियों के नाम।
🟤 पेशवाओं का “कुर्सीनामा” इत्यादि।

प्रश्न 2. बालक ने “मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा” क्यों कहा?
उत्तर:
🔵 यह रटाया गया उत्तर था; बालक को अर्थ का बोध भी नहीं था, पर सभाभवन में वाहवाही कराने हेतु उसे ऐसा बोलना सिखाया गया था।

प्रश्न 3. बालक द्वारा इनाम में “लड्डू” माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी?
उत्तर:
🟢 “लड्डू” माँगना बालक की स्वाभाविक प्रवृत्ति की विजय थी।
🔵 कृत्रिम, दिखावटी प्रशिक्षण के ऊपर सहज बाल-मन जीता—इससे लेखक को आश्वस्ति हुई कि “बालक बच गया।”

प्रश्न 4. पाठ में किन स्थलों पर लगता है कि बालक की प्रवृत्तियों का गला घोंटा जा रहा है?
उत्तर:
🔴 वार्षिकोत्सव में 8 वर्ष के बालक को नुमाइश की वस्तु की तरह प्रस्तुत करना।
🟡 उम्र से ऊपर के कठिन प्रश्नों का अभ्यास कराकर उत्तर रटवाना।
🟣 इनाम के नाम पर भी उससे “पुस्तक” जैसी अपेक्षा रखना—स्वाभाविक चाह दबाना।

प्रश्न 5. “बालक बच गया…” कथन के आधार पर उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ लिखिए।
उत्तर:
🔵 मिठाई/खेल जैसी सहज चाहतें।
🟢 दिखावे से अधिक सादगी और सचेतनता।
🟣 अवसर मिलने पर अपना मन व्यक्त कर देना।

प्रश्न 6. “उम्र के अनुसार योग्यता आवश्यक है; ज्ञानी/दार्शनिक होना आवश्यक नहीं।” ‘लर्निंग आउटकम’ पर विचार लिखिए।
उत्तर:
🔵 प्रारम्भिक अवस्था में लक्ष्य — जिज्ञासा, भाषा-संवेग, सामाजिक शिष्टता, खेल-आधारित सीख।
🟢 रटन्त को नहीं, समझ-आधारित छोटे-छोटे फलित को प्राथमिकता।
🟣 बच्चों को उम्रानुकूल कार्य, खेल, कहानी, चित्र—इन्हीं से सीख बढ़ती है; भारी दार्शनिक/वैज्ञानिक दावे थोपना अनुचित है।

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(ख) घड़ी के पुर्ज़े

प्रश्न 1. लेखक ने धर्म का रहस्य समझाने हेतु “घड़ी के पुर्ज़े” का दृष्टान्त क्यों दिया?
उत्तर:
🔵 जैसे घड़ी की रचना-प्रक्रिया जटिल है और उसे समझना/सुधारना घड़ीसाज़ जानता है, वैसे ही धर्म के नियम-तंत्र को कुछ लोग रहस्य बनाकर आम जन से दूर रखते हैं।
🟢 लेखक का संकेत—घड़ी देखना सीखो; धर्म को आँख मूँदे मानना नहीं, समझकर अपनाना चाहिए।

प्रश्न 2. “धर्म का रहस्य जानना वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है”—कितना सहमत/असहमत?
उत्तर:
🔴 असहमत।
🟢 धर्म का प्रभाव सब पर पड़ता है, अतः उसको समझना/परखना हर व्यक्ति का अधिकार है; केवल “ठेकेदारों” का एकाधिकार समाज के लिए अहितकर है।

प्रश्न 3. “घड़ी समय का ज्ञान कराती है”—क्या धर्म सम्बन्धी मान्यताएँ भी अपने समय का बोध कराती हैं?
उत्तर:
🟡 हाँ। हर युग की सामाजिक आवश्यकताएँ धर्म-विचारों में प्रतिबिम्बित होती हैं; समय बदलने पर पुरानी रूढ़ियाँ अप्रासंगिक हो जाती हैं—उनका पुनर्विचार जरूरी है।

प्रश्न 4. यदि धर्म कुछ लोगों (वेदशास्त्रियों/मठाधीशों/पुजारियों) की मुट्ठी में रहे तो आमजन का उससे क्या सम्बन्ध रह जाता है?
उत्तर:
🔴 तब धर्म जीवन-उपयोगी मार्गदर्शन न रहकर शक्ति-संरचना बन जाता है; आमजन प्रश्न पूछना छोड़ देते हैं और शोषण सम्भव होता है।
🟢 समाधान—लोक के लिए धर्म: मानवीयता, सत्य, करुणा, समता—इन मूल्यों को समझने-परखने की स्वतंत्रता।

प्रश्न 5. “जहाँ धर्म पर मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार होता है… वहीं आमजन से सम्बन्ध उसका विकास है”—तर्क सहित।
उत्तर:
🔵 एकाधिकार धर्म को संकुचित/अनुदार बनाता है।
🟢 जब विचार-विमर्श, शिक्षा, करुणा, सेवा जैसे लोकमूल्यों से धर्म जुड़ता है, तब वह समाज-हितकारक बनकर आगे बढ़ता है।

प्रश्न 6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए—
(क) “वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है कि घड़ी के पुर्ज़े जानें, तुम्हें इससे क्या?”
उत्तर:
🟣 यह उस प्रवृत्ति पर व्यंग्य है जो धर्म-ज्ञान को रहस्य बनाकर आमजन को अयोग्य ठहराती है, ताकि वे प्रश्न न करें।
(ख) “अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो, पर जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया है उसे तो देखने दो।”
उत्तर:
🟢 जो समझने-जाँचने में सक्षम हों, उनको रोकना नहीं चाहिए; विचार-स्वातंत्र्य से ही सत्य स्पष्ट होगा।
(ग) “हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो… फिर भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।”
उत्तर:
🔵 यह जड़ रूढ़ियों/वंशानुकरण पर चोट है—पुराना उपकरण बंद है, फिर भी नया सीखने देने को तैयार नहीं—यही सामाजिक जड़ता है।

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(ग) ढेले चुन लो

प्रश्न 1. वैदिककाल में कैसी “लॉटरी” चलती थी जिसका उल्लेख हुआ है?
उत्तर:
🔵 स्वयंवर का एक रूप—कन्या के सामने विभिन्न स्थानों की मिट्टी के ढेले रखे जाते; कन्या किसी एक ढेले को उठाती; ढेला जिस स्थल का, उसे शुभ-अशुभार्थ से जोड़ा जाता।

प्रश्न 2. “दुर्लभ बन्धु” की पेटियों की कथा लिखिए।
उत्तर:
🟢 हरिश्चन्द्र के “दुर्लभ बन्धु” में वर-चयन हेतु 3 पेटियाँ—सोने, चाँदी, लोहे—रखी जाती हैं; अकड़/लोभ विफल होता है, सच्चा प्रेमी साधारण (लोहे) पेटी चुनकर सफल होता है।

प्रश्न 3. “जीवन-साथी” का चुनाव मिट्टी के ढेलों से करने के कथित “फल” क्या थे?
उत्तर:
🔵 वेदि का ढेला—संतान ‘वैदिक पण्डित’।
🟡 गोशाला/गोबर का ढेला—‘पशुओं का धनी’।
🟣 खेत की मिट्टी—‘ज़मींदार पुत्र’।
🟠 मसान की धूल—अशुभ समझा जाता। (लेखक ने ऐसी रूढ़ियों पर व्यंग्य किया है।)

प्रश्न 4. कबीर की पंक्तियों का आशय लिखिए—
“पत्थर पूजे हरि मिले तो तू पूज पहार,
इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार॥”
उत्तर:
🟢 मूर्तिपूजा-आडम्बर से ऊपर उठकर परिश्रम/सेवा को श्रेष्ठ मानना; केवल प्रतीक पूजने से नहीं, लोककल्याण से अध्यात्म का अर्थ सिद्ध होता है।

प्रश्न 5. “जीवन-साथी का चयन ढेलों पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं; इसलिए बेटी का शिक्षित होना अनिवार्य है।” ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के सन्दर्भ में विचार लिखिए।
उत्तर:
🔵 रूढ़ि-आधारित निर्णय स्त्री-जीवन को जोखिम में डालते हैं; शिक्षा विवेक, आत्मनिर्णय और समान अधिकार देती है।
🟢 शिक्षित बेटी दकियानूसी मान्यताओं से बाहर निकलकर स्वस्थ, समतामूलक परिवार-समाज का आधार बनती है—यही लोकहित है।

प्रश्न 6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए—
(क) “अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है… लाखों-करोड़ों कोस दूर बैठे ‘ढेलों’ (ग्रह) की कल्पित चाल पर भरोसा करना क्यों अच्छा है?”
उत्तर:
🟣 लेखक प्रत्यक्ष-अनुभव, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि को महत्व देता है; अंध-आस्था/ज्योतिष पर व्यंग्य है।


(ख) “आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से; आज का पैसा अच्छा है कल की मोहर से।”
उत्तर:
🟢 यथार्थ-वर्तमान को प्राथमिकता—कल्पित/अनिश्चित भविष्य के भरोसे निर्णय न करें; व्यावहारिकता ही सुख-कल्याण का आधार है।


(ग) “आँखों देखा ढेला लाखों कोस दूर के तेज़ पिण्ड से अच्छा है।”
उत्तर:
🔵 प्रत्यक्ष प्रमाण/अनुभव, दूरस्थ/कल्पित गणनाओं से बढ़कर विश्वसनीय होता है—यही लेखक का तर्क है।

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अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) – 5 प्रश्न
प्रश्न 1. चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) दिल्ली में
(ख) जयपुर में
(ग) लखनऊ में
(घ) बनारस में
उत्तर: (ख) जयपुर में

प्रश्न 2. ‘सुमिरिनी के मनके’ में कुल कितने लघु निबंध संकलित हैं?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर: (ख) तीन

प्रश्न 3. बालक जब इनाम माँगने को कहा गया तो उसने क्या माँगा?
(क) पुस्तकें
(ख) खिलौने
(ग) लड्डू
(घ) कपड़े
उत्तर: (ग) लड्डू

प्रश्न 4. घड़ी के दृष्टांत से लेखक ने किस पर व्यंग्य किया है?
(क) समाज पर
(ख) धर्मगुरुओं पर
(ग) शिक्षा पर
(घ) राजनीति पर
उत्तर: (ख) धर्मगुरुओं पर

प्रश्न 5. ‘दुर्लभ बंधु’ नाटक के रचयिता कौन हैं?
(क) चंद्रधर शर्मा गुलेरी
(ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र
(ग) प्रेमचंद
(घ) जयशंकर प्रसाद
उत्तर: (ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र

लघु उत्तरीय प्रश्न – 5 प्रश्न
प्रश्न 6. बालक के चेहरे और आँखों की दशा का वर्णन करते हुए बताएं कि यह क्यों था?
उत्तर: बालक का मुँह पीला था, आँखें सफेद थीं और दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी। यह दशा उसकी उम्र से अधिक पढ़ाई के बोझ और अनावश्यक प्रदर्शन के कारण थी। उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों का दमन हो रहा था।

प्रश्न 7. बालक से कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए जो उसकी उम्र के अनुकूल नहीं थे?
उत्तर: बालक से धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, इंग्लैंड के राजा हेनरी आठवें की पत्नियों के नाम, पेशवाओं का कुर्सीनामा और पानी के चार डिग्री के नीचे शीतता फैलने के कारण जैसे प्रश्न पूछे गए।

प्रश्न 8. लेखक ने घड़ी का दृष्टांत क्यों दिया है?
उत्तर: लेखक ने घड़ी का दृष्टांत धर्म की जटिलता को समझाने के लिए दिया है। जिस प्रकार घड़ी को खोलना आसान है पर जोड़ना कठिन, उसी प्रकार धर्मगुरु आम लोगों को धर्म के बारे में भ्रम में रखते हैं।

प्रश्न 9. ‘ढेले चुन लो’ प्रथा में क्या होता था?
उत्तर: इस प्रथा में वर अलग-अलग स्थानों की मिट्टी के ढेले लाता था। वधू जो ढेला चुनती थी, माना जाता था कि उस स्थान के गुण के अनुसार उसकी संतान होगी।

प्रश्न 10. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की भाषा की विशेषताएं बताइए।
उत्तर: गुलेरी जी की भाषा सरल, सरस और बोलचाल की है। उन्होंने तत्सम, तद्भव और विदेशी शब्दों का सुंदर मिश्रण किया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग से भाषा में सजीवता आई है।

मध्यम उत्तरीय प्रश्न – 4 प्रश्न
प्रश्न 11. बालक द्वारा लड्डू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी? इसका क्या महत्व है?
उत्तर: जब बालक ने इनाम में लड्डू माँगा तो लेखक को बहुत राहत मिली क्योंकि यह उत्तर उसकी आयु के अनुकूल था। लेखक को लग रहा था कि शिक्षा के अत्यधिक बोझ से बालक का बचपन समाप्त हो गया है। लेकिन लड्डू की मांग से पता चला कि अभी भी उसके अंदर बालसुलभ प्रवृत्तियां जीवित हैं। यह दर्शाता है कि बच्चे पर शिक्षा को लादना नहीं चाहिए बल्कि उसकी स्वाभाविक रुचियों को बनाए रखना चाहिए।

प्रश्न 12. ‘घड़ी के पुर्जे’ निबंध के माध्यम से लेखक ने समाज की किस समस्या पर प्रकाश डाला है?
उत्तर: इस निबंध के माध्यम से लेखक ने धर्मगुरुओं द्वारा फैलाए गए अंधविश्वास और धर्म के नाम पर किए जाने वाले शोषण पर प्रकाश डाला है। जिस प्रकार घड़ी के पुर्जों को समझना जटिल लगता है उसी प्रकार धर्मगुरु धर्म को रहस्यमय बनाकर आम लोगों का शोषण करते हैं। वे लोगों को यह विश्वास दिलाते हैं कि केवल वे ही धर्म को समझा सकते हैं, जबकि वास्तव में धर्म सरल और सहज होता है।

प्रश्न 13. बालक की प्रवृत्तियों का गला घोंटे जाने के कौन से प्रमाण पाठ में मिलते हैं?
उत्तर: पाठ में कई स्थानों पर बालक की प्रवृत्तियों के दमन के प्रमाण मिलते हैं। पहला, आठ वर्षीय बालक को प्रदर्शनी की वस्तु बनाकर दिखाना। दूसरा, उससे उम्र से अधिक कठिन प्रश्न पूछना जो उसकी समझ से परे थे। तीसरा, बालक का डरा हुआ रहना और आंखें नीचे रखना। चौथा, उसके चेहरे पर कृत्रिम और स्वाभाविक भावों का संघर्ष दिखाई देना। ये सब बताते हैं कि बालक के साथ अन्याय हो रहा था।

प्रश्न 14. ‘दुर्लभ बंधु’ की पेटियों की कथा के माध्यम से लेखक ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर: ‘दुर्लभ बंधु’ में तीन पेटियां थीं – सोने, चांदी और लोहे की। अकड़बाज व्यक्ति सोने की पेटी चुनकर खाली हाथ लौटा। लोभी व्यक्ति चांदी की पेटी चुनकर निराश हुआ। लेकिन सच्चा और परिश्रमी व्यक्ति लोहे की पेटी चुनकर पुरस्कार पाया। इससे संदेश मिलता है कि दिखावे में न पड़कर सादगी और सच्चाई को अपनाना चाहिए। बाहरी चमक-दमक भ्रामक होती है, वास्तविक गुण सादगी में छुपे होते हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 15. ‘सुमिरिनी के मनके’ पाठ के आधार पर बताएं कि लेखक शिक्षा व्यवस्था में किन सुधारों की अपेक्षा करता है?

उत्तर: चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने ‘सुमिरिनी के मनके’ के तीनों निबंधों के माध्यम से तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर किया है और एक स्वस्थ शिक्षा प्रणाली के सुझाव दिए हैं।

‘बालक बच गया’ निबंध में लेखक स्पष्ट करता है कि शिक्षा बालक की आयु और मानसिक क्षमता के अनुकूल होनी चाहिए। बच्चे पर शिक्षा का बोझ लादना अनुचित है। शिक्षा को व्यक्ति के मानसिक विकास के लिए प्रस्तुत करना चाहिए, न कि शिक्षा के लिए मनुष्य को। बालक की स्वाभाविक रुचियों और प्रवृत्तियों को बनाए रखते हुए उसमें शिक्षा के प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा जगानी चाहिए।

‘घड़ी के पुर्जे’ में अंधविश्वास और रूढ़िवादी शिक्षा पर व्यंग्य करते हुए वैज्ञानिक सोच विकसित करने का संदेश दिया गया है। ‘ढेले चुन लो’ में भाग्यवाद के स्थान पर तर्कसंगत चिंतन को प्रोत्साहित किया गया है। लेखक चाहता है कि शिक्षा व्यवस्था में बच्चों की प्राकृतिक जिज्ञासा, खेल-कूद और आनंद का स्थान हो। रटंत प्रणाली के स्थान पर समझ आधारित शिक्षा हो जो बच्चों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करे।

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